
हमारे राष्ट्रीय नियोजन में भारतीयता, लोक तंत्र और समाज का जो संकल्प ग्रहण किया गया है, उस से भिन्न प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप से जो कार्यकलाप किया जाता है, वह प्रतिक्रियावाद के अन्तर्गत गण्यमान है। विडम्बना यह है कि आज का प्रत्येक राजनीतिक दल स्वयं को संवैधानिक संकल्पों के प्रति निष्ठावान घोषित करता रहता है। इन दलों से सक्रिय रूप से जुड़े हुए साहित्यकार भी स्वयं को प्रगतिशील मानते हैं। अतएव हर विचारधारा विपक्षी विचारकों पर प्रतिक्रियावादी होने का आरोप करती है और स्वयं को लोकसेवक घोषित करती है। तात्पर्य यह कि पिछले दशकों का यह एक विशिष्ट आन्दोलन है, जिसके माध्यम से यह आग्रह किया जाता है कि लेखक निरपेक्ष भाव से नहीं, वरन् पार्टीजन होकर एक विचारधारा से जुड़े और उसे ही अपने साहित्य के माध्यम से स्वरबद्ध करे। प्रतिबद्धता की यह मनोभूमि फ्रेंच साहित्य से प्राप्त हुई है। कोई लेखक एक्टिविस्ट (पार्टी कार्यकर्ता) हुए बिना सार्थक नहीं हो सकता, ऐसा प्रगतिशील आलोचकों का मत रहा है। हिंदी आलोचना में इस बीच प्रतिबद्धता का अन्यथा अर्थ ग्रहण किया गया है। यहाँ दलीय प्रतिबद्धता को भावात्मक सम्बद्धता (लगाव) के अर्थ में देखा जा रहा है, इसलिये कोई स्वयं को जीवन से प्रतिबद्ध मानता है, कोई मानव मूल्यों से प्रतिबद्ध मानता है और कोई सामाजिक प्रतिबद्धता की दुहाई देता है। वस्तुतः प्रतिबद्धता (कमिटमेंट) एक विशिष्ट राजनीतिक पारिभाषिक शब्द है, जिसका निश्चित अर्थ है साम्यवादी विचारधारा के साथ सम्पूर्ण बौद्धिक लगाव। इस दलीय विचारधारा के अतिरिक्त दूसरे सिद्धांतों के प्रति व्यक्त किये गये लगाव को पश्चिम में 'इंगेजी' या इंगेजमेंट' कहा जाता है, कमिटमेंट' नहीं। तात्पर्य यह है कि प्रतिबद्धता एक निश्चित दलदलीय भावधारा है, जिसमें किसी वैकल्पिक विचारधारा के चयन की छूट नहीं है। इस शब्द के सही आशय को ग्रहण न कर पाने के कारण प्रगति और प्रतिक्रिया का स्वरूप भी अनुद्घाटित रह गया है। इस प्रकार घोषित कर दिया गया है कि जो प्रतिबद्ध है, वही प्रगतिशील है और जो प्रगतिशील नहीं है, वह प्रतिगामी अथवा प्रतिक्रियावादी है।
प्रतिक्रियावाद के इस स्वरूप निर्धारण के पश्चात् आवश्यक है कि स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी साहित्य में परिलक्षित इसके मूलभूत तत्त्वों की ओर अंगुलि-निर्देश किया जाये। सर्वप्रथम सहवर्ती साहित्य में प्राप्त धर्म निरपेक्षता की समस्या विचारणीय है। हमारे देश में विभिन्न प्रकार के धार्मिक मत-मतान्तर, अनेकानेक आचार-विचार और सांप्रदायिक, जातीय तथा वर्ण व्यवस्था विषयक व्यवहार प्रचलित हैं। संवैधानिक प्रतिज्ञा के अनुसार हमें अपने धार्मिक संस्कारों और जातीय आचार विचारों के प्रति आस्था व्यक्त करने का अधिकार है अन्य धर्मावलम्बियों की आस्थाओं पर आक्षेप करने का अधिकार नहीं है। हमारा संविधान पंथ-निरपेक्ष है, इसलिये किसी साम्प्रदायिक, जातीय वर्ग व्यवस्था का खण्डन करना निषिद्ध है। इधर कुछ विधर्मी और विदेशी वर्गों द्वारा भारतीय सनातन के विरोध नारा लगाया गया है। इस दिशा में चिन्तन-मनन की आवश्यकता है। हड़बड़ी में 'नानसेकुलर' का फतवा दे देने से अनिष्ट होगा, उसी प्रकार जैसे भूषण को असहिष्णु, अनुदार, कट्टर हिन्दू और मुस्लिम द्रोही कवि कहकर पाठ्यक्रम से निष्कासित कर देने से हिन्दी कविता का अहित हुआ। हमें उर्दू कविता में व्याप्त बुतपरस्त तथाकथित 'काफिरों' के प्रति व्यक्त कुफ्र को मिटाना होगा, साथ ही हिन्दी को सकीर्ण हिन्दुत्व से बचाना होगा। 'गजवा ए हिन्द' जैसा नारा निश्चय ही एक प्रतिक्रियावादी आचरण है।
प्रतिक्रियावाद का दूसरा महत्वपूर्ण घटक है- राष्ट्र वादी विचारधारा का विरोध। सर्वांगीण विकास इस युग की माँग है, इसलिए प्रतिगामी शक्तियों में भी उसका प्रत्यक्षतः विरोध करने का साहस नहीं है। वे प्रकारान्तर से राष्ट्रीय विचारधारा का विरूपण करते हुए दिखायी देते हैं। इस विचारधारा से जुड़े हुए लेखक या तो सामन्तों अर्थात् राजा-महाराजाओं की न्याय-निष्ठा, उनकी शासन-व्यवस्था और उनकी अतिमानवीयता का गुणगान करके सामन्तवाद का पक्ष-समर्थन करते रहते हैं, या प्रायः प्राचीन भारतीय संस्कृति के बहाने राजन्य संस्कृति की यशोगाथा अंकित करते हैं और इस प्रकार अधिनायकवाद की पुष्टि करते हैं। प्रतिगामी लेखक कथा-व्याज से श्रेष्ठि पुत्रों और कोट्याधीशों के प्रति उदार दृष्टिकोण व्यक्त करते हुए आज की पूँजीवादी महाजनी व्यवस्था के कालुष्य पर पर्दा डालने का प्रयत्न करते हैं। यह निश्चयही प्रतिक्रियावादी तत्त्व हैं। वर्तमान साहित्य में महानगर बोध अथवा नगरीकरण के आत्यंतिक विवरण-वर्णन द्वारा केवल एक वर्ग (शहरी इलीट वर्ग) को ही चित्रित किया जाता है। इसके कारण सर्वहारा की उपेक्षा हुई है। भारत का सर्वहारा वर्ग मुख्यतः गाँवों में स्थित है। शहरों में भी यह उपनगरीय बस्तियों (स्लम्स) में बसा हुआ है। हमारे साहित्य में कथा-कुतूहल की दृष्टि से इस वर्ग का संकेत यत्र-तत्र भले ही आ गया हो, यों गहरे रागात्मक बोध के स्तर पर उनका पूरा समाजशास्त्र प्रस्तुत नहीं किया जा रहा है। इस बीच का साहित्य कॉफी हाउस, पहाड़ी आरामगाहों और तथाकथित बौद्धिक आवारा औरतों का साहित्य बनकर रह गया है। प्रयोग कौतुक, कलात्मक चाकचिक्य और वैचारिक औदार्य (फ्री लाउड थिंकिंग) उसमें काफी दिखायी देता है, पर लोक चेतना अपेक्षाकृत कम व्यक्त हुयी है। इस लेखन द्वारा समाज को विभिन्न वर्गों में विभक्त कर दिया गया है, जिससे सहअस्तित्व के भाव को आघात लगा है। इसी प्रकार समाज विरोधी कुछ अन्य उपकरण साहित्य जगत में प्रकट हुए हैं, जिनके कारण जनवादी विचारधारा का अन्यथा रूप ही प्रकाश में आया है। कुछ लेखकों ने अपने निहित संकीर्ण स्वार्थवश समाजवाद, गाँधीवाद, सर्वोदय, अन्त्योदय आदि के बीच विवाद उत्पन्न कर दिया है और यथावसर मानववाद को इसके विकल्प रूप में खड़ा कर दिया है। प्रगतिशील वर्ग ने ऐसे लेखकों को सी. आई. ए. एजेन्ट, अमेरिकी दलाल कहकर तथा प्रतिक्रियावादी वर्ग ने पूँजीवादियों की क्रांति को सांस्कृतिक क्रांति कहकर दिग्भ्रमित कर दिया है। इसमें कोई संदेह नहीं कि इनकी अति आधुनिकता के नाम पर योनोतेजक प्रसंगों, काम-कुंठाओं और आत्मरति पूर्ण मनःस्थितियों के रसमय चित्रण में उलझ कर हमारी युवा पीढ़ी व्यवस्था-विद्रोह से परांगमुख होकर कई विषम परिस्थितियों का शिकार हो गयी है। आधुनिकता के नाम पर मृत्युबोध, ऐब्सर्डबोध, पलायन और विक्षोभ के जो स्वर मुखरित हुए हैं, वे हमारी मध्ययुगीन मानसिकता के सूचक हैं। इनके कारण साहित्य में सात्विक अमर्ष अथवा आक्रोश नहीं उभर पाया है, जिससे साहित्य का उद्दिष्ट अधूरा रह गया है, और सर्वहितकारी विचारधारा को क्षति पहुँची है। हमारा बुद्धिजीवी वर्ग इस अव्यवस्था से असहमत होकर भी शुतरमुर्गी-वृत्ति धारण किए हुए है। वह स्वयं हाँथी दाँत की मीनार पर बैठा हुआ है, 'यूटोपिया' में रह रहा है, हर समस्या से बौद्धिक अलगाव अनुभव कर रहा है और इसलिए वह प्रतिक्रियावादी हो गया है। प्रतिक्रियावादी तत्त्वों का एक पक्ष वह है, जो लोक तांत्रिक व्यवस्था की अवमानना कर रहा है। लोकतंत्र में व्यक्ति के बजाय लोक अर्थात् समष्टि को अर्हता दी जाती है। समकालीन हिन्दी साहित्य में व्यक्तिवाद और व्यक्ति पूजा का जो उपक्रम दिखाई देता है. वह परोक्षतः अधिनायकवाद का अनुमोदक है। अजनबीपन (एलीनियेशन) मोहभंग और कुण्ठाभाव भी इसका पृष्ठपोषक है। यह सर्वथा अलोकतांत्रिक है। इससे वाक्रस्वातंत्र्य और मौलिक अधिकारों की कदर्थना होती है, साथ ही उग्रवादी, फासिस्टी एवं असंसदीय प्रवृत्तियों को बढ़ावा मिलता है। लोकतंत्र की अवमानना करने के कारण नागरिक कर्तव्यों की अवहेलना का स्वर भी इस बीच प्रस्फुटित हुआ है। इस प्रकार अलोकतांत्रिक लक्षणों का प्रतिपादन करते हुए स्वातंत्र्योत्तर साहित्य ने हिप्पी दर्शन, बीटल कविता तथा पीढ़ीबोध का गलत नारा दिया है। सत्तासापेक्ष प्रचारवादी (सरकारी) साहित्य इसी कोटि में गणनीय है।
प्रतिक्रियावादी लेखन का एक और खतरनाक रूप आंचालक सहित्य के रूप में प्रकट हुआ है। आँचलिकता द्वारा प्रान्तीयता अथवा क्षेत्रीयता की अनावश्यक वृद्धि हुई है। इससे राष्ट्रीय भावात्मक एकता में गतिरोध उत्पन्न हुआ है। आंचलिकता जब तक आदिम-अज्ञात भूमियों तक सीमित थी, तब तक वरेण्य थी, लेकिन जबसे वह देश के विभिन्न जनपदों अर्थात् साँस्कृतिक एवं भाषायी इकाइयों की प्रतिस्पर्धा को उकसाने लगी है-तबसे वह निरन्तर हानि पहुँचाती जा रही है। जहाँ-कहीं भाषायी कट्टरता का प्रदर्शन किया गया है और पृथकतावादी नीति को समर्थन दिया गया है, वह सब अराष्ट्रीय अर्थात्' प्रतिक्रियावादी है। समसामयिक लेखकों ने अपनी वैचारिक संकीर्णता द्वारा हमारी सामयिक चेतना पर आधात किया है। प्रायः कुछ विचित्र कहने के दुराग्रहवश उन्होंने पश्चिम से उधार लिए हुए जो अतिबौद्धिक नारे छेड़े हैं, उनमें दिशा हीनता के स्पष्ट लक्षण है।
इस प्रकार प्रकट है कि समकालीन हिन्दी साहित्य में प्रतिगामी तत्त्व काफी सक्रिय हैं। आज आवश्यकता इस बात की है कि प्रगतिशीलता का दम भरने वाले और छद्मरूप से प्रगति का विरोध करने वाले इन प्रतिक्रियावादी तत्त्वों का मुखौटा उधेड़ा जाये तथा ऐसे तत्त्वों को हतोत्साह किया जाये। सम्प्रति प्रगति और प्रतिक्रिया शब्द वैचारिक फैशन से ग्रस्त होकर विवाद संकुल हो उठे हैं। प्रायः वैयक्तिक राग-द्वेष के कारण एक दूसरे की छवि को धूमिल करने की नीयत से हम उस पर प्रतिगामिता का आरोप कर देते हैं। उदाहरणार्थ इस संदर्भ में दिनकर और अज्ञेय का नाम लिया जा सकता है। अज्ञेय को उस समय कम्युनिस्ट कहा गया था, जब कम्युनिस्ट होना अपराध था। कालांतर उन्हें प्रतिक्रियावादी कहा गया है। एक संदर्भ में उन्होंने स्वयं इस पर विक्षोभ प्रकट करते हुए कहा है कि इस बीच मुझे जो सबसे बड़ी गाली मिली है, वह यह कि मैं प्रतिक्रियावादी हूँ। यही स्थिति दिनकर की रही है। स्वतन्त्रता संग्राम के बीच दिनकर प्रगतिशील माने जाते थे। पश्चात् सत्ता से सम्बद्ध हो जाने के कारण उनको प्रतिक्रियावादी मान लिया गया। यह एक प्रकार की बौद्धिक अति है। इसमें कोई संदेह नहीं कि प्रतिक्रियावादी तत्त्वों से बचे रहने के लिए प्रगतिशील लेखकों को सदैव व्यवस्था विद्रोह को वरण करना चाहिए। क्योंकि क्रांति की सफलता के बाद क्रांतिकारी लेखक के लिए कुछ शेष नहीं रह जाता। वह व्यवस्था का अनुगत हो जाता है और फिर उसकी सारी ऊर्जा बुझ जाती है। विद्रोही लेखक असहमति को अपना दर्शन मानकर चलता है और इसलिए उसका व्यक्ति विवेक सुरक्षित रहता है, किन्तु सत्ता का लोभ संवरण कर पाना सहज नहीं है। मुक्तिबोध इसीलिये अपने समानधर्माओं को बार-बार याद दिलाते हुये पूछते हैं-
'बशर्ते तक करो किस ओर हो तुम? सुनहले ऊर्ध्व आसन के दबाते पक्ष में अथवा किसी टूटी कटी उस निम्न कक्षा के अंधेरे में, कहाँ हो तुम?'
यह एक शाश्वत यक्ष प्रश्न है। इसी प्रश्नोत्तर द्वारा ही प्रतिक्रियावाद की सही परख-पहचान सम्भव है। अतएव समकालीन विचारकों के समक्ष यह एक चुनौती भरा हुआ प्रश्न है कि वे वर्तमान लेखन में अन्तर्निहित प्रगतिवादी और प्रतिक्रियावादी तत्त्वों को अलग-अलग करके उनका निर्भ्रांत स्वरूप स्पष्ट करें, ताकि साहित्यिक फतवेबाजी समाप्त हो जाये।
हार्दिक शुभकामनाएं
प्रोफ़ेसर सूर्यप्रसाद दीक्षित