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व्यंजना


अतिथि संपादक की क़लम से


Surya_Prasad_Dixit

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वर्तमान तंत्र और साहित्य की सहभागिता


देश के स्वतंत्र होने और लोकतांत्रिक व्यवस्था के लागू होने से लेकर अमृतोत्सव मनाने तक हमारे साहित्य में क्या कैसा परिवर्तन घटित हुआ यह एक पुनर्विचारणीय विषय है कि स्वातंत्रयोत्तर साहित्य की चहुंमुखी विकास की बात करते हैं इसीलिए आजादी के 75 वर्षों के पश्चात हिन्दी साहित्य में भी कुछ बेहतर परिवर्तन दिखने चाहिए। इसी के आधार पर शताब्दी वर्ष 2047 के संभावित विकसित भारत का भी आइये पूर्वाभ्यास करें।


पहला परिवर्तन जो सर्वाधिक प्रकट है वह है अभिव्यक्ति के अधिकार से प्रेरित व्यवस्था विरोधी लेखन। भारतीय संविधान ने हमें स्वतंत्र और व्यापक मानवाधिकार जैसे सूचना अधिकार, मताधिकार आदि प्रदान किए हैं। संविधान और संसद ने जो सपने संजोए थे उनसे प्रभावित होकर बहुत दिनों तक हिंदी साहित्यकार मंगलाशाओं से जुड़े रहे, किंतु एक दशक के भीतर ही उनका मोहभंग हो गया। वे आक्रोश-विद्रोह की मुद्रा धारण करके बड़बड़ाने लगे। इसमें वह वर्ग भी था जो प्रगतिशीलता के नाम पर मार्क्स से प्रभावित था या जो आजादी की लड़ाई में प्रायः अंग्रेजों के साथ था, जो लोकतंत्र के प्रति उदासीन या अप्रस्तुत था। जो किसी दूसरी तरह की आजादी (पार्टी डिक्टेटरशिप) चाहता था, जो रूस का मॉडल लेकर चल रहा था और जो गांधी जी के नेतृत्व से असहमत था। उस प्रगतिशील वर्ग ने सबसे पहले विभाजन का मुद्दा उठाकर संवेदना के स्तर पर सत्तारूढ़ दल को उसका जिम्मेदार ठहराया। फिर उसने विकास योजनाओं की खिल्ली उड़ाई यह विचार किए बिना के विभाजन अपरिहार्य था और हजारों वर्षों की गुलामी से जुड़ी समस्याओं का कोई जादुई समाधान रातोंरात नहीं हो सकता था। उन्होंने बंगाल तथा केरल में कोई नमूना भी नहीं रखा। वस्तुत यह समाधान तीन प्रकार से संभव था- 1- साम्यवादी' सख्त अनुशासन द्वारा 2- गांधीवादी हृदय-परिवर्तन द्वारा 3- सच्ची जन सहभागिता द्वारा।


इसी बीच गांधी जी के आकस्मिक तिरोधान और रूसी, अमेरिकी विकास मॉडल के सम्मोहनवश अन्य कोई विकल्प प्रभावी नहीं हो पाया। नेहरू जी का यह मत था कि धर्म हानिकारक है। भौतिक (आर्थिक) विकास से ही सारी समस्याएं हल हो जाएंगी फलतः देश तथाकथित धर्म निरपेक्ष हो गया। अर्थोपार्जन परम पुरुषार्थ बन गया जिससे नेतागण नौकरशाह, अर्थ पिशाच के चंगुल में फंस गए। इस बीच के साहित्यकारों ने आर्थिक भ्रष्टाचार को इसीलिए अपनी रचनाओं का मुख्य मुद्दा बनाया। वे यह नहीं मान पाये कि बेधरम समाज का पापकर्मी हो जाना अवश्यम्भावी होता है।


भारत के मताधिकार, मानवाधिकार और सूचनाधिकार की जो संवैधानिक व्यवस्था थी वह आदर्शवादी तो थी किंतु पूर्ण व्यावहारिक नहीं थी। यहां शत प्रतिशत मताधिकार दे दिया गया। इससे बड़े-बड़े अपराधी, राष्ट्रद्रोही, अशिक्षित माफिया आदि धन बल और जन बल के सहारे वोट की राजनीति में छा गये। चुनाव की सुचिता समाप्त हो गई। प्रजातंत्र की इस दुर्दशा पर साहित्यकार कुढ़ने के अलावा क्या कर सकते थे? धूमिल ने लिखा- ' संसद तेली की वह घानी है, जिसमें आधा तेल आधा पानी है। '


धूमिल को पेट और प्रजातंत्र के बीच दराज दिखाई दी। इन्हें सारा प्रजातंत्र मदारी का खेल (तमाशा) जैसा लगा। उनके अनुसार इस व्यवस्था की परिणति दो रूपों में हुई। एक है गया वालों की रिरियाती हुई हथेली और दूसरी है नक्सलियों की तनी हुई मुट्ठी। इन गैरजिम्मेदार कवियों ने नक्सलियों को बेजा बढ़ावा दिया। अधिकतर लेखक माओवादी हो गए। सर्वेश्वर ने यह महसूस किया है लोकतंत्र की अब कोई कद्र नहीं रह गई है। वे लिखते हैं कि लोकतंत्र को जूते की तरह लाठी में लटकाए लोग भटक रहे हैं। गोरख पांडेय लिखा कि- आज का जन प्रतिनिधि चिल्लाकर कह रहा है की कुर्सी ना मिले तो भाड़ में जाए प्रजातंत्र। पिछले छह दशकों से विकास की जगह यही विनाश लीला चल रही है और जनता उदय प्रकाश के मतानुसार यही पूछ रही है कि 'तुम कौन से सरकार हो जो राक्षस की तरह आते हो तबाही मचाते हो और सब समेट कर उठा ले जाते हो।' दिनकर जी ने जनतंत्र का स्वागत करते हुए लिखा था, 'सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।' उनकी कामना थी कि इस देश में किसानों की सरकार बने। हल और कुदाल राज चिन्ह बने। पर कुछ ही दिनों बाद उन्हें लगा कि इस देश में नरमेध की तरह कृषक मेध होने लगा है। आजादी की पूर्व संध्या पर गिरिजा कुमार माथुर ने सावधान किया था- 'आज जीत की राज पहरुवे सावधान रहना।' पर हम सावधान नहीं रहे। बड़े-बड़े विधिवेत्ता थे, किंतु वे नहीं समझ पाए कि सबको असीमित मताधिकार देने से वोट खरीदे जाने लगेंगे। बूथ कैपचरिंग होगी। माफिया तंत्र ' सौ भेंड़ें एक भेड़िया' वाली कहावत के अनुसार बुजदिल जनता पर हावी हो जाएगा। सत्तारूढ़ और प्रतिपक्षी दलों की सारी अचार संहिताएं धरी रह जाएंगी। संविधान निर्माता यह पूर्वाभास नहीं कर पाए कि वोट के पीछे सांप्रदायिकता, जातीयता, क्षेत्रीयता, लिंग भेद, भाषा भेद, काला धन आदि को बढ़ावा मिलेगा। पिछले छह दशकों में ये सारी विकृतियाँ सामने आईं, जिससे संवेदनशील साहित्यकार आहत हुए किंतु उनका अरण्य रोदन अब किसी काम का नहीं रहा। पहले वे भी इनके साथ व्यूहवहा में या क्यू में थे यानी जन से परे हो गए थे।


इस प्रकार के मुक्त लेखन का नियंत्रण करना इसे राष्ट्रद्रोही लेखन तथा असंसदीय कह कर व्यंग्य-विद्रूपपूर्ण और मुक्त पत्रकारिता पर प्रतिबंध लगाना बृहत्तर हित माना गया। इसी क्रम में पुस्तकों की मूल्य वृद्धि, भूत लेखन, प्रशासन तथा बिक्री संबंधी भ्रष्टाचारों के विरुद्ध कार्रवाई पर विचार हुआ। हिंदी लेखकों ने ऑथर गिल्ड के समक्ष विचार व्यक्त करते हुए कहा कि हमारा साहित्य जनता से दूर है। अब हिंदी साहित्य को नए सिरे से जनता के निकट आने का दायित्व निभाना है, क्योंकि यही उसकी सार्थकता की सबसे बड़ी चुनौती है। फिर भी इस साहित्य का असली मुखौटा प्रकट हो ही गया, जब आपातकाल लागू किया गया, जिससे मौलिक अधिकार( सप्त स्वातंत्र्य ) स्थगित हो गए और प्रेस सेंसर लागू कर दिया गया।


हिंदी रचनाकारों पर इसकी बहूविध प्रतिक्रिया हुई। अधिकांश कवि- लेखक इमरजेंसी के समर्थक बन गए। वे व्यक्ति पूजा के स्तर पर उतर आए। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी, नामवर सिंह, सोहनलाल द्विवेदी, श्रीकांत वर्मा, रघुवीर सहाय आदि राष्ट्रीय लेखक मंच( सरकारी फोरम) से जुड़ गए। प्रतिवादी लेखक इसे अनुशासन पर्व मानकर राष्ट्रीय जीवन का वरदान घोषित करने लगे। तात्पर्य यह कि अधिकतर लेखक लोकतंत्र की जगह प्रचारतंत्र की चपेट में आ गए। कुछ रचनाकार इस स्थिति से असहमत भी दिखे। यह अपने-अपने स्थान पर इसका प्रत्याख्यान करते रहे, भले ही उनका स्वर बहुत प्रभावित न सिद्ध हुआ हो अथवा शासन ने उन्हें खतरनाक करार देकर भले ही कर काराबद्घ न किया हो। यों भी इमरजेंसी के बीच बहुत कम साहित्यकारों को मीसा में बंद किया गया। कारण, शासन जानता है कि एक साहित्यकार का आज कितना प्रभाव रह गया है? ऐसी स्थिति में बेवक्त अकारण उसे हीरो बनाने का लाभ? जो साहित्यकार इस अवधि में दंडित हुए, उन पर प्रायः साहित्येतर अभियोग थे।


उक्त दोनों वर्गों के अतिरिक्त कई साहित्यकार तटस्थ रहे। अज्ञेय जी मौन की दहाड़ सुनते रहे। सुख सुविधाओं के अभ्यस्त जोखिम भरी चुनौती के साहस से शून्य अपने आभिजात्य से आबद्ध ये कवि लेखक भूमिगत लेखन करते रहे या प्रतीकों, रूपकों, गूढ़ोक्तियों, अन्योक्तियों के सहारे कूट रचना करते रहे जो पुरअसर न सिद्ध हो सका। पत्रकार वर्ग तो पूरी तरह कलम का सौदागर बन बैठा अर्थात उनका अधिकांश लेखन दिशाहारा हो गया क्योंकि उनके मालिक विज्ञापन के लोभ अथवा सेंसर के भयवश सरकारी भोंपू बने हुए थे। आपात स्थिति के बाद हमारे साहित्य ने कई करवटें लीं। अधिकतर रचनाकार एक स्वर में अपदस्थ शासन की भर्त्सना करने लगे। पत्र पत्रिकाओं में दूसरी आजादी के नाम पर वे भांति भांति की रचनाएं लेकर प्रकट हुए और घोषणा करने लगे कि यह रचना आपातकाल के दौरान लिखी गई थी पर प्रेस सेंसर के कारण प्रकाशित नहीं हो पाई थी। अब वह अपने मूल रूप में प्रकाशित हो रही है। इन घोषणाओं में कुछ के पीछे सत्य भी हो सकता है पर अधिकतर लेखकों ने अपने तत्कालीन नवागत शासन को प्रसन्न करने के लिए ही यह तरीका अपनाया था। यह आचरण लोकतांत्रिक सुचिता, सत्य निष्ठा और बौद्धिक ईमानदारी से परे ही कहा जाएगा।


इसकी विचित्र परिणति दिखाई पड़ी जनता शासन की समाप्ति और पूर्व सत्ता की वापसी के बाद। अवसरवादी कवि लेखक समुदाय असमंजस में पड़ गया कि 'कसमै देवाय हविषा विधेम।' वे आपात स्थिति जैसी किसी पूरक व्यवस्था के अनुकूल नई मानसिकता धारण करने के यत्न में केंद्रित हो गए। ज्यादातर रचनाकार नकारवाद बौद्धिक वितंडावाद में फंसे रहे। लोक से काफी दूर। निष्कर्ष यह है कि गत दशकों की हिंदी साहित्य वर्ष प्रतिवर्ष बदलते हुए अपने रूप रंग के बावजूद भटकाव की स्थिति में रहा। यह उल्लेखनीय है कि भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। इस बीच कई देशों का लोकतंत्र ध्वस्त हो गया है किंतु हम सुरक्षित हैं। हमारी आर्थिक विकास दर बढ़ी है। हमने उत्पादन, अंतरिक्ष विज्ञान, परमाणु शक्ति आदि क्षेत्रों में पर्याप्त प्रगति की है जिसकी सराहना साहित्यकारों द्वारा भी की जानी चाहिए थी। उन्हें जन सामान्य की समस्याओं जैसे साक्षरता, आतंक, सांप्रदायिकता, ग्रामीण विकास, दहेज, घूस आदि के व्यावहारिक समाधान सुझाने चाहिए थे, किंतु यह वर्ग राष्ट्रीय धारा से कटा रहा और आत्मनिर्वासन का छद्म में भोगता रहा।


दूसरे भारतीय लोकतंत्र जिन दिनों राजनीतिक छल छंद में गिरफ्त रहा उस बीच हिंदी साहित्यकार सत्ता निरपेक्षता का नारा देकर अपनी पलायन वृत्ति के कारण प्रायः कलात्मक करतब में खोए रहे। साहित्यकारों ने पहले शायद सोचा हो कि उन्हें भी बुद्धिजीवी मानकर शासन में कहीं जगह मिलेगी लेकिन माखनलाल चतुर्वेदी, बालकृष्ण शर्मा 'नवीन', दिनकर जैसे रचनाकारों तक को सत्ता ने अपेक्षित महत्व नहीं दिया जबकि कई कई वर्ष इन्होंने जेल में बिताए थे चुनाव लड़कर संसद में पहुंचे थे और जननायकों के बहुत निकट थे। दिनकर जी ने तो 'लोक देव नेहरू' नामक जीवनी तक लिख डाली थी। उनके आदेशानुसार आईजन होवर का स्वागत गीत भी लिखा था। अज्ञेय ने नेहरू अभिनंदन ग्रंथ का संपादन किया था। किंतु पार्टी में इन सब का वर्चस्व कमजोर होने और इनके हिंदी प्रेमी होने के कारण इन्हें कैबिनेट में शामिल नहीं किया गया। इस उपेक्षा से प्रतिक्रिया प्रेरित होकर हिंदी साहित्यकार प्रायः हताश होकर सत्ता निरपेक्ष हो गए और फिर जुट गए प्रयोगवाद, अति यथार्थवाद, लघु मानववाद, व्यर्थताबोध, नव अध्यात्म, मनोविश्लेषण, अस्तित्ववाद, संरचनावाद, क्षेत्रीय प्रकृति प्रेम, उत्तर आधुनिकता, विखंडन वाद जैसे बौद्धिक चोंचलों तथा पश्चिम से आयातित बाजरू नारों में। फिर कुंठित साहित्यकारों ने असंसदीय शब्दों में गाली गलौज तक शुरू कर दी। कई लोग समग्र क्रांति में कूद पड़े। राजनीतिक लेखन उनका मुख्य प्रतिपाद्य हो गया। फलतः दमन चक्र शुरू हुआ। जब सेंसर लागू हो गया तो यह साहित्य बिखर गया।


भारतीय लोकतंत्र ने हिंदी पर एक और चोट की भाषावार प्रांतों का विभाजन करके। उसने लगभग दो ढाई दर्जन भाषाओं को (हिंदी की छोटी-छोटी बोलियों तक को) स्वतंत्र भाषा की मान्यता दे दी। उर्दू को कई राज्यों की द्वितीय राजभाषा बनाकर हिंदी से जुदा कर दिया गया और हिंदी को राष्ट्रभाषा पद से अपदस्थ करके मात्र राजभाषा बना दिया गया। छठे दशक के बाद हमारा शासन और साहित्य दोनों काफी कुछ विपथित हो गए। इस बीच हम चीन से परास्त हुए। हालांकि बांग्लादेश में विजयी हुए। पर अंतरराष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्थावश, विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका, पत्रकारिता और दलीय राजनीति में भयानक भ्रष्टाचार भर गया। साहित्य भी उससे प्रभावित हुआ। सरकारी संस्थाएं साहित्यकारों को जो अनुदान देती हैं, जो पुरस्कार प्रदान करती हैं, जिस प्रकार शासन में उनका मनोनयन करती हैं, और उन्हें राज्याश्रय प्रदान करती हैं उनका कोई मानक स्थापित नहीं हो पाया। नेताओं ने मनोनयन का अधिकार अपने कब्जे में रखा जिससे लोकतंत्र को आघात लगा और सृजन चिंतन प्रकाशन फिल्म पाठ्यक्रम आदि पर संकीर्ण दलीय राजनीति, कमीशन खोरी, तुष्टीकरण आदि प्रवृत्तियां हावी हो गईं। साहित्य भी इस भ्रष्ट व्यवस्था का अंग हो गया, फलतः प्रबुद्ध पाठक उनसे अलग हो गए। केवल अपनी विदुषकी यह कंठकाकली के कारण कुछ मंचीय पेशेवर कलाकार ही सुने जाते रहे।


युग युग से साहित्य या तो इबादत का अंग रहा है या शहादत का। कुव्यवस्था का अंग होकर कोई साहित्यकार जनजीवन में प्रतिष्ठा नहीं पा सकता है। तुलसी, कबीर से लेकर भारतेंदु, द्विवेदी मंडल तक का साहित्य सत्ता निरपेक्ष होकर ही लोकप्रिय हुआ है। रीति काव्य धारा के कवि अवश्य राज दरबारों से जुड़े रहे किंतु चाटुकार होकर नहीं प्रायः कविराज या राजकवि होकर। आधुनिक युग के अधिकतर साहित्यकारों की विडंबना यह है कि वे न सत्ता में समादृत हुए न जन जीवन में। हां मैथिली शरण गुप्त, नवीन, माखनलाल चतुर्वेदी, निराला, दिनकर, सनेही आदि अपनी वाचिक परंपरा के कारण अवश्य जनजीवन से जुड़े रहे, जबकि कला कवियों का दायरा क्रमशः सिमटता चला गया। इन्होंने जनपदीय कवियों साहित्यकारों चिंतकों कवियों पत्रकारों शिक्षकों समीक्षाकों को अपनी बिरादरी से बाय काट कर दिया। फलतः यह अल्पसंख्यक कमजोर हो गए। कविर्मनीषी परिभुः स्वयंभू होने का उनका भ्रम टूट गया।


आज आवश्यकता है साहित्य को लोक से जोड़ने की, सही राजनीति में न्याय पक्ष की भूमिका अपनाने की, भ्रष्टाचार की निंदा करने की और जन प्रबोधन करते रहने की। यदि क्रोध और करुणा को स्वर देते हुए वाचिक काव्य कला के सहारे हम नुक्कड़ गोष्ठियों में सक्रिय हो जाएं, चुनाव प्रचार में उतर पड़ें और भय तथा प्रलोभन त्याग कर प्रबुद्ध नागरिक के रूप में सक्रिय हो जाएं तो इसे पुनः जन समर्थन प्राप्त हो सकता है। रहा लोकतंत्र का प्रश्न। हम आज जिस लोकतंत्र में रह रहे हैं उसे देखकर कभी-कभी लगता है कि यह पार्टी तंत्र है, कुल तंत्र है या व्यक्ति तंत्र है। जहां व्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन करके पार्टी यह व्हिप जारी करती है कि उसके ही पक्ष में अमुक को वोट देना है, जिस संसद में पैसा लेकर प्रश्न पूछे जाते हैं, जहां शोर शराबे के बल पर निर्णय लिए जाते या बदले जाते हैं, जहां रोज ही आया राम गया राम होता रहता है, जहां बहुमत के पीछे खरीद फरोख्त होता है, जातीय तुष्टीकरण चलता रहता है, जहां अपराधों पर पर्दा डाला जाता है, तुरंत स्टे हो जाता है, उस पर फैसला कई-कई वर्षों तक नहीं होता। जहां लोकपाल विधेयक, काला धन और भ्रष्टाचार के पीछे हीले हवाले किए जाते हैं, जहां रेवड़िया बांटी जाती हैं, जहां महामहिमों को स्वेच्छानुसार बड़े-बड़े पदों पर अपने चहेतों को मनोनीत करने का अधिकार प्राप्त है, और जहां निरवधि आरक्षण है वह अधिनायक वाद से बेहतर व्यवस्था तो नहीं ही है। आदर्श लोकतंत्र तो कदापि नहीं है। सच्चे लोकतंत्र के लिए हमें संविधान के ढांचे में काफी परिवर्तन करना होगा। चुनाव प्रक्रिया बदलनी होगी। यदि एकल राष्ट्र स्तरीय पार्टी बहुमत में ना हो तो राष्ट्रपति शासन लगाना होगा। जब कानून का राज चलेगा तभी साहित्यकार भी राज्याश्रय का लोभ त्याग कर अपनी सच्ची भूमिका पर उतरेगा। हम उस आदर्श व्यवस्था के आवाहन में सक्षम तो नहीं पर फिर भी प्रतीक्षा कर रहे हैं।


हमारे दैनिक जीवन में इस भौतिक व्यवस्था में साहित्य की उपयोगिता शून्यवत है। कुछ पेशेवर मंचीय मसखरी कवि मंडलियों केअलावा कोई पूर्णकालिक कवि लेखक का करियर बनाने की घोषणा नहीं कर पा रहा है। बस भूत लेखन (छद्म लेखन) कर लेता है। नेताओं ने कुछ लिखिया पाल लिए हैं। वे मीडिया प्रोपेगेंडा करते हुए पाला बदलते रहते हैं। यह प्रायोजित लेखन इन दिनों अति पर है। कई समयपार्खी लेखक विमर्शों में अटके लटके भटके दिखाई देते हैं। दलित, महिला, आदिवासी, दिव्यांग, किन्नर और अप्रवासी जैसे कई चोंचले हैं जिनसे लोग ऊब गए हैं।


जनता ने एक-एक कर सारी विधाओं को उपहासास्पद बना दिया है। नाटक का वास्तविक अर्थ छल प्रपंच लीला कहानी है, मनगढ़ंत झूठी कविता है, अविचारित प्रगल्भ भावालाप आलोचना है, निंदा पत्रकारिता है सनसनी। पहले भी इसे भड़ैती भट्भणंत(भणिति त) ही मानते थे। बाद में शब्द सिद्ध साहित्यकारों ने अपने लिए भारी भरकम सूक्तियां गढ लीं लेकिन अब उनकी निकिल उतर गई है। हम सिद्ध नहीं कर पाएंगे कि साहित्य लिखने पढ़ने वाला व्यक्ति अन्य व्यक्तियों की तुलना में बेहतर मनुष्य भी होता है। यदि आध्यात्म के सहारे साहित्य दिव्य मानव को बना लेता या विज्ञान के सहारे ऐसे हारमोंस साहित्य के माध्यम से तैयार कर लेता जिससे मानव चरित्र बन जाते तो इसकी उपयोगिता लौट आती। बहरहाल यह साहित्य सृजन सुख विरेचन रस रंजन का हेतु तो है ही।


हार्दिक शुभकामनाएं


प्रोफ़ेसर सूर्यप्रसाद दीक्षित


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