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व्यंजना


अतिथि संपादक की क़लम से


Surya_Prasad_Dixit

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सत् साहित्य की आचार संहिता


साहित्यसृजन कदापि रचनाकार का वमन एवं विरेचन नहीं है। वह सबके सहित होने और सबका हित करने का महाभाव है। भारतीय साहित्यशास्त्र में उसे व्यवहारबोध हेतु कांतासम्मित उपदेश और सद्य: परिनिवृति से परिपूरित अध्यात्म (साहित्याध्यात्म) माना गया है, लोक एवं लोकोत्तर का मानुष भावों एवं देशकाल जन्य मूल्यों का मानक कहा गया है।


साहित्याध्यात्म की समृद्धि के लिये आवश्यक है कि अतिआधुनिकता और पाश्चात्यीकरण के प्रभाव से बचा जाए। साहित्य का गहरा संबंध प्रकृति-परिवेश से होता है, न कि मात्र महानगर बोध से। इन दोनों के बीच समन्वय स्थापित करना आवश्यक है। हमें अमीर-गरीब, मालिक-मजदूर, किसान यानी हर वर्ग के आबाल वृद्ध नर नारी अर्थात् वैविध्यपूर्ण समुदाय से जुड़ना है। उनका यदि सूक्ष्म पर्यवेक्षण किया जाये तो समकालीन साहित्य भारतीय समाज की सहज स्वाभाविक तस्वीर बन सकती है।


इस बीच युवा मानस में पीढ़ियों के द्वन्द्व, क्रांति, विद्रोह, जनसंघर्ष आदि की चर्चा बहुत हुई है। युवा ऐसे जोशीले शब्दों से ज्यादा प्रभावित होता है। क्रांति अथवा आंदोलन वरेण्य हैं, बशर्ते उनका लक्ष्य स्पष्ट हो और वे वृहत्तर हित में हों। भारत में जबसे मतदान की उम्र १८ वर्ष कर दी गई है, तबसे कई राजनीतिक दलों ने युवा वर्ग को भिन्न-भिन्न नारों से लुभाने का अभियान चला रखा है। युवा पीढ़ी को अपेक्षित अथवा उन्नत रोजगार के अवसर प्राप्त नहीं है। वह स्वभावतः महत्वाकांक्षी है। मीडिया के श्रव्य दृश्य माध्यमों ने उसे काफी भटका दिया है। उसके समक्ष आस्था का संकट है। उसके सकारात्मक सोच का संकट दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है, फलतः वह आतंकी, अराजकतावादी तथा आत्महंता हो सकता है। अस्तु, इस ह्रासोन्मुखी पीढ़ी को बचाना अत्यावश्यक है। सरकार ने विवेकानंद जयंती को युवादिवस के रूप में मनाने की योजना बनाई है। किन्तु धार्मिक आयोजनों से उसे मनोवैज्ञानिक चिढ़ जैसी है। उसके सामने रोलमॉडल हैं- दलीय नेता, अभिनेता, क्रिकेटर और वे खलनायक, जो अपने छल-छद्म से भौतिक उत्कर्ष के शिखर पर पहुँच गये हैं। वर्तमान प्रवाह की विडंबना यह है कि नायक से ज्यादा खलनायक लोकप्रिय है। व्यवस्था का विरोध करना आज एक 'हॉबी' हो गयी है। इस प्रजातंत्र ने जो अभिव्यक्ति स्वातंत्र्य दिया है, जो मानवाधिकार दिये हैं, उनके जरिये ही यह क्रुद्ध युवापीढ़ी कुछ ज्यादा ही प्रगल्भ हो गयी है। बेवक्त की कुंठाओं ने सारी मंगलाशाओं पर पानी फेर दिया है। इस मनोविज्ञान को बदलना बहुत जरूरी है। अंतरराष्ट्रीय प्रचार समितियाँ देश/देशांतर का चाकचिक्य दिखाकर उसे अवसाद की ओर ले जा रही हैं। इस अपप्रचार से दुगुना और चौगुना सद्प्रचार जब तक नहीं किया जायगा, तब तक अनुशासित ढंग से यह पीढ़ी विकास कार्यों की ओर नहीं लौटेगी। जब तक व्यवस्था पर वृद्ध पीढ़ी का एकाधिपत्य बना रहेगा और जब तक माफिया तंत्र हावी रहेगा, तब तक समस्या का स्थायी समाधान नहीं होगा। नयी पीढ़ी को कर्तव्य पथ पर आरूढ़ करने के लिये आवश्यकता है आध्यात्मिक 'डोज' की, यानी ऐसे साहित्य की जो इन दो संवेदनाओं को मुखर करे (१) क्रोध (२) करुणा। महर्षि वाल्मीकि का पहला श्लोक इन्हीं दो संवेदनाओं का वाहक था। करुणा अन्तस के भीतर तक पैठ जाती है और क्रोध उसमें ओज का संचार करता है। एक अंतरमुखी वृत्ति है, दूसरी बर्हिमुखी। इन दोनों से ओतप्रोत हमें ऐसी रचनाएँ देनी होंगी, जिनमें दरिंदों को ललकारा गया हो कि ऐसे गौरवशाली राष्ट्र को अपने कुकृत्यों से कैसे नरक बना दिया है इन सबने। इससे जो जुगुप्सा, वेदना, फिर उत्तेजना मिलेगी, वह युवजन के लिये, पूरी व्यवस्था के लिये वरदान सिद्ध होगी।


स्वतंत्र राष्ट्र में साहित्य-सृजन का कोई राष्ट्रीय एजेंडा नियमतः नहीं लागू किया जा सकता, किन्तु युक्ति पूर्वक करणीय और अकरणीय का चित्रफलक दिखाकर उन्हें आकृष्ट तो किया ही जा सकता है। साहित्य-अध्यात्म के सहारे हमें नवप्रबुद्ध रचनाकारों को प्रेरित करना होगा कि वे राष्ट्रीय इतिहास के स्वर्णिम अध्याय पर प्रकाश डालें। महान चरित्रों पर रचनाएँ करें। देश के शोषित-वंचित लोगों के साथ खड़े हों। वे हमें उपेक्षित वर्ग से परिचित करायें। साहित्य को जीविकोपार्जन से जोड़ें। जीवन-मूल्य को बाजार मूल्य से परास्त न होने दें। स्त्री चेतना को स्वर दें, पर लिंग-भेद न भड़कायें। आरक्षण को न्यायोचित न ठहराएँ, दलितों (गरीबों) की सहायता करते रहें। भारतीय जीवन की शुचिता को आत्मसात करें। प्रकृति की ओर लौटें। परिवार भावना से जुड़ें। यथार्थ को आदर्शोन्मुखी बनाये रखें। समस्याओं के व्याहारिक समाधान सुझायें और सच्चे नागरिक होने का फर्ज अदा करें।


साहित्य की सर्वांगीण प्रगति के लिये अपेक्षित है कि ज्ञान, विज्ञान, तकनीक और भाषा, विचारधारा, शिल्प आदि के नये क्षितिजों से अपने साहित्य को समृद्धतर करते रहें। उपयोगी परंपराओं को बचायें और प्रगति की नई संभावनाओं को बढ़ायें। इसके लिए अनुवाद प्रशिक्षण, संचार तकनीक आदि की बड़ी आवश्यकता है। फिल्म और श्रव्य-दृश्य माध्यम और जनसंचार माध्यम यदि उद्योगपतियों के चंगुल से मुक्त हो जायें तथा सरकारी प्रतिबंधों से भी, तो उन्हें प्रभावी एवं सर्वोत्तम माध्यम बनाया जा सकता है। केवल सनसनी,अश्लीलता और विवादी स्वर भर देना अभीष्ट नहीं होगा। इनके व्यवस्थित पाठ्यक्रम होने चाहिये तथा सोद्देश्य सृजन की पहल होनी चाहिये। मनोनयन, प्रोत्साहन, पुरस्कार का विधान और आवश्यक नेटवर्क होना चाहिये। सबसे बड़ी आवश्यकता है कि इन सबके चित्त के उदात्तीकरण का प्रयास किया जाए। आज की रचनात्मक भाषा में शालीनता घटती जा रही है। सहिष्णुता की जगह आक्रामकता बढ़ती जा रही है। इससे वैचारिक प्रदूषण अथवा दुर्भावना का संकट बढ़ेगा। हमें यह भी प्रयन्न करना होगा कि कथनी और करनी में ज्यादा अंतर न रहे। यह मानना होगा कि संप्रेषण मात्र शब्द का नहीं, कर्म का होता है। जब दिल से बात निकलती है तो दूसरे के दिल में पैठती है अन्यथा वाक्छल बनकर रह जाती है। साहित्य से मनोरंजन होता है, साथ-साथ प्रबोध भी आवश्यक है। कोरा उपदेश नहीं, संवेदना के द्रव में घुला हुआ संदेश। केवल उक्ति-वैचित्र्य या जुम्लेबाजी, केवल नकारवादी कुतर्क और केवल हीन ग्रंथियों में उलझा 'एब्सट्रैक्ट' चिंतन किसी काम का नहीं होता है। मौलिकता के लिये स्वाध्याय-संपदा की जरूरत होती है, साथ ही शुद्ध नीयत की। जब सत्साहित्य की नींव पड़ती है तब यह साहित्य आध्यात्मिक चेतना से एकीकृत हो जाता है। इससे रहित साहित्य को मनोरुग्ण कलमकारों का विरेचन कहा जा सकता है। जिसके पास दूरगामी 'विजन' नहीं होता, वह मात्र पापबोध का वमन करता रहता है। आइए, साहित्य के अध्यात्मशास्त्र का यह आदर्श अपनाएँ।।


हार्दिक शुभकामनाएं


प्रोफ़ेसर सूर्यप्रसाद दीक्षित


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